तुलसी विवाह रीति रिवाज और कथा
हिंदू मान्यता के अनुसार तुलसी जी मां वृंदा का रूप हैं। वृंदा के इस रुप की भगवान विष्णु के साथ […]
हिंदू मान्यता के अनुसार तुलसी जी मां वृंदा का रूप हैं। वृंदा के इस रुप की भगवान विष्णु के साथ शादी करने को तुलसी विवाह कहा जाता है।अरबों-खरबों साल पहले सब जगह अंधेरा ही अंधेरा था, फिर एक जबरदस्त विस्फोट हुआ। विस्फोट से इतनी ऊर्जा निकली कि कई ग्रह बन गए। हमारी पृथ्वी भी उनमें से एक थी। धीरे धीरे पानी आया। ऑक्सीजन का बैलेंस हुआ और फिर पेड़ पौधे बने। इन्ही पेड़ पौधों की बदौलत इंसान पैदा हुए और धरती पर जीवन संभव हुआ। हमारी प्रकृति ने हमें मां की तरह पाला है और अब हम जब खुद को संभालने के लायक हो गए हैं तो हम अपनी प्रकृति को पूजते हैं। तुलसी के पौधा जो कि हमारी हर तरह के रोगों से रक्षा करता है वो हमारी जिंदगी का हिस्सा है। हिंदू मान्यता के अनुसार तुलसी जी मां वृंदा का रूप हैं। वृंदा के इस रुप की भगवान विष्णु के साथ शादी करने को तुलसी विवाह कहा जाता है। भगवान के भक्त पूरे रीति रिवाजों के साथ तुलसी के पौधे की विष्णु भगवान रुपी शिला के साथ विवाह करते हैं। इस विवाह के पीछे एक पौराणिक कथा है।

कौन हैं तुलसी और क्यों किया जाता है विवाह?
कई साल पहले वृंदा नाम की एक स्त्री थी उसका विवाह जलंधर नाम के असुर से हुआ। वृंदा बहुत पतिव्रता थी और हमेशा अपने पति के लिये पूजा पाठ करती रहती थी। एक बार देवताओं और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा -स्वामी आप युद्ध पर जा रहे हैं आप जब तक युद्ध में रहेगें में पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिए अनुष्ठान करुंगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते मैं अपना संकल्प नही छोडूगीं। वृंदा के पूजा के प्रभाव से जलंधर का बल बढ़ गया और युद्ध में कोई भी देवता उनको हरा नहीं पाया। देवताओं में हाहाकार मच गया। सभी मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और विनती करने लगे। भगवान विष्णु को तुंरत पता चल गया कि ये सब वृंदा के जप और पतिव्रता होने के कारण हो रहा है। भगवान ने जलंधर राक्षस का रुप धारण कर लिया और उसके महल पहुंच गए। पूजा पाठ में लीन वृंदा ने जैसे ही अपने पति को महल में आते देखा तो खुशी के मारे पूजा छोड़कर उनके पास चली गई और चरण छू लिये। ऐसा करते ही पूजा का संकल्प भी टूट गया और स्त्रित्व भी भंग हो गया। ये होते ही जलंधर का बल कम हो गया और देवताओं ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। सिर गिरता हुआ जलंधर के महल में ही आ गिरा। वृंदा ने जैसे ही अपने पति का सिर देखा तो गुस्से से अपने सामने खड़े शख्स से पूछा कि वो कौन है। तब भगवान विष्णु अपने असली रूप में आ गए। वृंदा ने पति वेदना में रोते हुए श्राप दिया और कहा कि जिस तरह से तुम्हारा हृदय पत्थर का है उसी तरह तुम भी पत्थर के हो जाओ। ऐसा करते ही विष्णु भगवान पत्थर के हो गए। ये पता चलते ही देव लोक में सब परेशान हो गए। हाथ जोड़ कर वृंदा जी से प्रार्थना की गई। काफी विनती के बाद वृंदा ने भगवान को वैसा ही कर दिया और अपने पति के साथ सती हो गई।
वृंदा जहां सती हुई वहां उसकी राख रह गई थी। कुछ दिन बाद वहां से एक पौधा निकला। भगवान विष्णु ने उस पौधे को “तुलसी” नाम दिया। भगवान ने कहा कि यहां मेरा रूप भी पत्थर यानि शालिग्राम के तौर पर रहेगा और जो भी तुलसी के साथ शालिग्राम का विवाह करवाएगा उसका घर धन संपदा से भर जाएगा। आज भी तुलसी के पत्ते के बिना शालिग्राम जी को प्रसाद नहीं चढ़ता है।
तुलसी कथा का वीडियो
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